तेरे इंतज़ार में हर एक लम्हा गुजरता है, खामोशियों में भी तेरा नाम आदाब से बसरता है। जब तू पास होती है, हर दर्द की दवा मिल जाती है, तेरे बिना ये जिंदगी जैसे एक अधूरी तस्वीर बनकर रह जाती है।
तेरे बिना ये शामें भी खामोश हैं, तेरे बिना हर लम्हा बेताब है। तू ही तो है जो मेरे दिल में बसा है, तेरे बिना ये दिल भी तन्हा है।
हर सुबह एक नया सपना लाए, खुशियों के साये, दुःखों को भगाए। खुले आसमान में चिड़ियों की गुनगुन, आपका दिन हो रोशन, यही है मेरी दुआ।
ज़िंदगी की उलझनों में जब थकावट बढ़ जाती है, तेरे पास आकर हर शिकायत कहीं ठहर जाती है। यही तो बड़ों वाला इश्क़ है ऐ मेरे हमनवा, जहाँ तेरी ज़रा सी मौजूदगी से तबीयत संवर जाती है।
ना कोई दिखावा ना अब वो बचकानी ज़िद रही, इश्क़ अब ख़ामोशी से एक-दूसरे को समझने लगा है। तुम्हारी एक नज़दीकी ही काफ़ी है मेरी रूह के लिए, कि बिन छुए भी ये दिल सुकूँ से धड़कने लगा है।
दिन भर की थकान और ज़माने की बंदिशों के बाद, तुम्हारी बाँहों में सिमटना ही असली सुकूँ लगता है। अब सिर्फ़ हुस्न की चाहत नहीं रही इस उम्र में, तेरी रूह से मेरी रूह का जुड़ना जुनूँ लगता है।
कमरे की मद्धम रोशनी और तेरी सांसों की सरगोशी, फ़ासले मिटाने को काफ़ी है ये मीठी सी मदहोशी। हम दोनों के दरमियाँ जो यह अनकही सी कशिश है, यही तो इश्क़ की सबसे बालिग और हसीन ख़्वाहिश है।
काँच की खिड़की पर ढलती शाम और चाय का कप, तेरी उंगलियों की छुअन में सिमटती मेरी हर धड़कन। ज़माने से छुपकर जब तू मुझे यूँ देखती है, उसी एक इशारे पर ठहर जाता है मेरा सारा ज़हन।
दिन भर की थकान जब शहरों में सो जाती है, तेरी सांसों की गरमाइश में रात ठहर जाती है। कुछ न कहकर भी जब तू ज़ुल्फ़ें हटाती है, ज़िंदगी बस उसी एक लम्हे की होकर रह जाती है।
खिड़की से जो धूप छनकर चेहरे को छूती है, लगता है जैसे तुम्हारी उंगलियां मुझे जगा रही हैं। नया दिन सिर्फ नया उजाला नहीं मेरे लिए, तेरे साथ एक और शाम बिताने की वजह ला रही है।