
ना कोई दिखावा ना अब वो बचकानी ज़िद रही, इश्क़ अब ख़ामोशी से एक-दूसरे को समझने लगा है। तुम्हारी एक नज़दीकी ही काफ़ी है मेरी रूह के लिए, कि बिन छुए भी ये दिल सुकूँ से धड़कने लगा है।

ज़िंदगी की उलझनों में जब थकावट बढ़ जाती है, तेरे पास आकर हर शिकायत कहीं ठहर जाती है। यही तो बड़ों वाला इश्क़ है ऐ मेरे हमनवा, जहाँ तेरी ज़रा सी मौजूदगी से तबीयत संवर जाती है।

दिन भर की थकान और ज़माने की बंदिशों के बाद, तुम्हारी बाँहों में सिमटना ही असली सुकूँ लगता है। अब सिर्फ़ हुस्न की चाहत नहीं रही इस उम्र में, तेरी रूह से मेरी रूह का जुड़ना जुनूँ लगता है।

कमरे की मद्धम रोशनी और तेरी सांसों की सरगोशी, फ़ासले मिटाने को काफ़ी है ये मीठी सी मदहोशी। हम दोनों के दरमियाँ जो यह अनकही सी कशिश है, यही तो इश्क़ की सबसे बालिग और हसीन ख़्वाहिश है।
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