
जब तन्हाई की चादर ओढ़ी, तेरे बिना हर सुबह अधूरी। आँखों में बस गई हैं यादें, फिर भी दिल है बेकरार, न जाने क्यों।

वो कौन सा सहरा था, जहाँ तूने मुझे छोड़ा, हर कदम पर तेरा ही एहसास मेरे साथ है। खामोशियों में तेरी यादें बसी हैं यूँ, जैसे चाँद की रौशनी, रात के वीराने में।

तेरे बिना ये दुनिया जैसे सुनसान, सपने बटोरकर भी मिले नहीं कोई अरमान। हर रूह में बस तेरा ही नाम है, बिछड़ने की इस खामोशी में, क्या फिर भी कोई एहसान है?

तेरे बिना ख़ामोश हैं ये कमरे, सपनों में भी अब तेरा अक्स नहीं, ज़िंदगी की हर लहर में बसा है दर्द, लेकिन तुझसे कहने का कोई मौसम नहीं।
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