
तेरे जाने का ग़म हर शाम हमें घेर लेता है, चाँद भी अब उदास है, तेरा चेहरा नहीं दिखता है। दिन में भी छुपा है, तन्हाई का साया, तेरे बिना हर लम्हा बस ख़ामोशी की परछाई।

तेरे बिना ख़ामोश हैं ये कमरे, सपनों में भी अब तेरा अक्स नहीं, ज़िंदगी की हर लहर में बसा है दर्द, लेकिन तुझसे कहने का कोई मौसम नहीं।

जब होंठों पे नाम तेरा, पर दिल में चुप्पी हो, तेरे बिना हर सुबह जैसे, एक अधूरी सुबह हो। आँखों में बसी हैं यादें, वो मुस्कान अब कहां, खुशियों की सारी परछाइयां, अब बस एक साया हैं।

जब खामोशियों ने बात की, दिल के दर्द को कैसे छुपा लिया। आँखों में आँसू हैं, पर चेहरे पर हंसी, खुद से ही इस नाटक को निभा लिया।
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